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सामाजिक सदभाव के लिए सहकारिताएं आज समय की जरूरत : नायडू

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने जोर देकर कहा है कि आज जाति का कोई मायने नहीं है और ऐसे समय जबकि लोगों के मन में जाति , पंथ और धर्म के भेद भरने के प्रयास चल रहे हैं , सामाजिक सदभाव कायम करने के लिए सहकारिताएं आज समय की जरूरत हैं। नायडू ने जोर दिया कि चरित्र , योग्यता , क्षमता और व्यवहार आज सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण हैं। पर उन्होंने इस बात पर क्षोभ जताया कि कुछ लोग अब भी इसकी जगह जाति , समुदाय , धन और बाहुबल को बढावा दे रहे हैं।
उपराष्ट्रपति ने आज यहां 19 वें वैकुंड भाई मेहता स्मृति व्याख्यान में कहा कि सहकारिताओं द्वारा जिन सिद्धान्तों और मूल्यों का पालन किया जाता है उससे न केवल उन्हें अपने कारोबार को बढ़ाने में मदद मिलती है , बल्कि जाति , पंथ या किसी अन्य पहचान से अलग सामाजिक सदभाव भी कायम करने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा , ‘‘ आज जबकि जाति , पंथ या धर्म लोगों के दिमाग पर हावी होने का प्रयास कर रहा है , सहकारिता समय की जरूरत बन चुकी है। ’’ उन्होंने कहा कि ‘आज जाति की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है।’ इस व्याख्यान का आयोजन भारतीय राष्ट्रीय सहकारिता संघ (एनसीयूआई) ने किया था। नायडू ने भारतीय सहकारिता क्षेत्र के पथप्रदर्शक नेता वैंकुंठभाई मेहता का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी रुचि राजनीति से अधिक महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यों में थी। उन्होंने कहा , ‘‘ उस समय और आज की जरूरत रचनात्मक कार्य है। हम समाज के कुछ वर्गों में अधिक टकराव देख रहे हैं जो अच्छा नहीं है। हमें रचनात्मक रुख रखने की जरूरत है। ’’ज्यादातर जिला सहकारिता बैंकों के कर्ज में डूबे होने पर चिंता जताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इसकी मुख्य वजह ‘ कुप्रबंधन ’ है प्रणाली की विफलता नहीं।

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